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मृदुला सिन्हा - एक परिचय

हिन्दी साहित्य की जानी-पहचानी लेखिका श्रीमती मृदुला सिन्हा साहित्य के साथ सामाजिक और राजनैतिक जीवन में भी सक्रिय रहकर एक आंदोलनात्मक व रचनात्मक दृष्टि लिए तीनों क्षेत्रों के बीच समन्वय स्थापित करती रही हैं। उन्हीं के शब्दों में- ‘‘साहित्य, राजनीति और सामाजिक सरोकार एक ही व्यक्ति के जीवन में मिलता है। तीनों क्षेत्रों में कार्यरत व्यक्ति का लक्ष्य समाज का उत्थान ही है। दरअसल राजनैतिक कार्यकर्ता सर्वप्रथम सामाजिक कार्यकर्ता होता है। वह साहित्यकार है तो और उत्तम।’’

 

संक्षिप्त जीवन परिचय

मुजफ्फरपुर जिला (बिहार) के छपरा गांव में 27 नवंबर, 1942 को जन्मीं श्रीमती मृदुला सिन्हा ने अपनी प्रारंभिक छात्रावासीय शिक्षा बालिका विद्यापीठ, लखीसराय (बिहार) से प्राप्त की। उन्होंने बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर से मनोविज्ञान में स्नातकोत्तर (द्वितीय श्रेणी) एवं शिक्षा में स्नातक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। विश्वविद्यालय की शिक्षा पूर्ण करने के बाद महिला काॅलेज, मोतिहारी (बिहार) में मनोविज्ञान के प्राध्यापक के रूप में अपना सार्वजनिक जीवन प्रारंभ किया। इसके कुछ समय बाद जनसंघ पार्टी के नेता माननीय नानाजी देशमुख के मार्गदर्शन में उन्होंने मुजफ्फरपुर में एक आदर्श विद्यालय भारतीय शिशु मंदिर की स्थापना की। संस्थापक प्रधानाचार्य के रूप में उन्होंने आठ वर्षों तक इस विद्यालय का संचालन किया।

अंग्रेजी भाषा के विद्वान एवं विश्वविद्यालय में व्याख्याता डाॅ0 रामकृपाल सिन्हा से उनका विवाह हुआ। डाॅ0 सिन्हा राजनीति में सक्रिय रहे। उन्होंने राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री और केंद्र सरकार में राज्य मंत्री के पद को सुशोभित किया। विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक पद से सेवानिवृत्त डाॅ0 सिन्हा भारत के शासक दल भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय कार्यालय के प्रभारी रहे हैं।

 

साहित्यिक उपलब्धियाँ

विद्यार्थी जीवन से ही संवेदनशील मृदुला सिन्हा की साहित्यिक गतिविधियों तथा सृजनात्मक लेखन के प्रति रुचि विकसित हो गई। उन्होंने लघु कथाएं, कहानियां, उपन्यास, चिंतनपरक और ललित निबंधों की रचना की। भारतीय समाज की बदलती हुई परिस्थितियों में आम आदमी, विशेषतया महिलाओं की सामाजिक, राजनैतिक एवं मनोवैज्ञानिक समस्याएं और संदर्भ उनके रचनात्मक लेखन के मुख्य सरोकार हैं। उनकी रचनाओं में ग्रामीण अंचल की मिट्टी की सौंधी महक विद्यमान है। श्रीमती सिन्हा की गणना हिंदी की प्रथम कतार की लेखिकाओं में होती है।

 

लोकसाहित्य

अपने सृजनात्मक लेखन के द्वारा उन्होंने लोक जीवन, लोक कलाओं, लोक गीतों और लोक कथाओं को नई ऊर्जा और गति प्रदान की है। इनकी सार्थकता तथा प्रभावशीलता को प्रस्तावित करते हुए इन्हें निरंतर गतिशील बनाए रखने का आग्रह किया है। उनके ही शब्दों में - “मैं लोकगीतों, लोकोक्तियों और कहावतों में ही सोचती हूं। मानव मन, उसकी विशेषताओं, हास-परिहास, संस्कार और व्यथा समझने के लिए लोक साहित्य के पन्ने ही पलटती हूं।”

 

मिथकीय स्त्री पात्रों का औपन्यासिक वर्णन

महिलाओं के बीच कार्य करते हुए इन्होंने महिलाओं और विशेषकर युवतियों को उनका गौरवमय इतिहास स्मरण दिलाते हुए मिथकों से विशेष नारी पात्रों की कथाएं आत्मकथा शैली में लिखा है। सीता, सावित्री, मंदोदरी की आत्मकथाओं के लोकप्रिय होने और कई भारतीय भाषाओं एवं आंग्लभाषा में अनुदित होने पर अब ‘‘अहल्या उवाच’’ पूरी की हैं।

 

प्रसारण

श्रीमती सिन्हा रेडियो, दूरदर्शन तथा निजी क्षेत्र के टेलीविजन चैनलों द्वारा राजनैतिक मुद्दों तथा महिलाओं और बच्चों पर आयोजित विचार-विमर्श में नियमित रूप से भाग लेती रही हैं। समय पर उनके लेख-निबंध तथा विचारपूर्ण साक्षात्कार विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते हैं। उन्होंने टेलीविजन कार्यक्रमों के लिए बहुआयामी आलेख भी लिखे हैं। विभिन्न विधाओं में 56 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित (1978 से लेकर अब तक) हो चुकी हंै। 2017 में विभिन्न विधाओं में 12 पुस्तकें प्रकाशानाधीन हैं।

इनके द्वारा लिखी गई राजमाता विजयाराजे सिंधिया की आत्मकथा ‘‘राजपथ से लोकपथ पर’’ पर आधारित हिन्दी फिचर फिल्म ‘‘एक थी रानी ऐसी भी’’ का निर्माण किया गया है। ’राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम’ ने वृद्धों की समस्याओं पर आधारित उनकी एक कहानी पर फीचर फिल्म ’दत्तक’ का निर्माण किया है। श्रीमती सिन्हा ने केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड के दो आडियो सीडी- ’चेतना’ तथा ’पहचान’ के लिए गीत तथा आलेख लिखे हैं। उन्होंने तीन पीढ़ियों के एक छत के नीचे रहने का संदेश देने वाली बोर्ड की टेली फिल्म ’खेल खेल में’ की गीतमय पटकथा भी लिखी है। इनके उपन्यास ’ज्यों मेहँदी को रंग’ पर इसी नाम से बना धारावाहिक अनेकों बार दर्शाया गया है। इनका कहना है -‘‘संग चले जब तीन पीढ़ियाँ, चढ़े विकास की सभी सीढ़ियाँ।’’

 

स्वभाव और विशेष गुण

श्रीमती सिन्हा बचपन से ही संवेदनशील हैं। समाज के उपेक्षित एवं वंचित वर्गों के प्रति उनमें सहानुभूति ही नहीं, उनके लिए कुछ करने का जोश भी है। वे विभिन्न मंचों से इन वर्गों के हितों तथा परिवार से जुड़े मुद्दों को उठाती रही हैं। वे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में स्त्री और पुरुष की व्यावहारिक समानता की सशक्त पैरोकार हैं।

वे महिलाओं की समस्याओं को महिलाओं तक सीमित नहीं मान कर उन्हें पूरे समाज की समस्याओं के रूप में देखती और समझती हैं। इसलिए वे इन समस्याओं के समाधान के लिए पूरे समाज को पहल करने का आह्वान करती हैं। वे अर्द्धनारीश्वर में निहित परस्पर पूरकता की धारणा को समाज में स्त्री और पुरुष की समानता के प्रतीक के रूप में अपनाने की आग्रही हैं। श्रीमती सिन्हा स्त्री-पुरुष को एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी की बजाय पूरक के रूप में मानती हैं। वे नारी को पुरुष की तुलना में विकास के अधिक अवसर और अधिक सम्मान दिलाने की पक्षधर हैं। उनकी मान्यता है कि पारिवारिक और सामाजिक विकास में नारी की भूमिका पुरुष की तुलना में अधिक होने के कारण वह विशेष है। इसलिए वह बार-बार नारी को विशेष अवसर देकर, पुरुष से आगे ले जाने का आग्रह करती हैं।

इनके साहित्य के लिए इन्हें कई साहित्यिक सम्मानों से सम्मानित किया गया हैं। बिहार विश्वविद्यालय ने वर्ष 2015 में इन्हें डीलिट की मानद उपाधि से सम्मानित किया है।

 

राजनैतिक जीवन

यूँ तो 1964 में अपने पति द्वारा राजनैतिक जिम्मेदारी (जनसंघ पार्टी के जिलाा अध्यक्ष) लेने के उपरांत श्रीमती सिन्हा कार्यकर्ताओं के साथ स्नेह संपादन करने लगीं। भारतीय जनसंघ पार्टी की दो सक्रिय महिला सदस्याओं ने उन्हें पार्टी का सदस्य (4 आने शुल्क में ) भी बना दिया था। 1977 में मृदुला सिन्हा मुजफ्फरपुर जिले के संसदीय क्षेत्र की महिला संयोजिका बनीं। 1980 में भारतीय जनता पार्टी बनने के बाद नई दिल्ली के लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के चुनाव में महिला संयोजिका बनीं। उस पद पर आसीन होकर इन सक्रियता एवं बहुआयामी व्यक्तित्व ने नेताओं के मन में इनकी पहचान बनाई। इसलिए 1980 में महिला मोर्चा के गठन के बाद राजमाता विजया राजे सिंधिया को संयोजिका और इन्हें सहसंयोजिका बनाया। संगठन का रूप और ढंाचा बदलने पर वे महिला मोर्चा की प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष बनी। तबसे लेकर आजतक इन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। केन्द्रिय स्तर पर विभिन्न पदों पर कार्यरत रहीं।

श्रीमती सिन्हा ने विभिन्न राजनीतिक पदों पर आसीन होकर दल के अंदर और समाज में अपनी विशेष पहचान बनाईं हैं। वर्तमान में श्रीमती सिन्हा गोवा की राज्यपाल के पद पर आसीन हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने उन्हें स्वच्छता अभियान का अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाया। वे अपने संवैधानिक पद को गरिमापूर्वक निभाती हुई समाज के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर जीवन के अनेकानेक कार्यों को प्रोत्साहित करती हैं। सामाजिक समस्याओं का रचनात्मक निदान ढूँढ़ना ये बोलकर और लिखकर भी करती हैं।